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बिस्मिल्लाह से शुरू पहली रामायण

कोलकाता :धर्म और मजहब के बीच के भेदभाव को मिटाता एक धार्मिक ग्रंथ, या यूं कहे कि ग्रंथ के पवित्र शब्द क्या जानें धर्म का भेदभाव. वाल्मीकि रामायण तो सबने पढ़ी व देखी होगी. लेकिन, बिस्मिल्लाह-अर्रहमान-अर्रहीम से शुरू होते इस पवित्र ग्रंथ को किसी ने देखा है? ये नायाब रामायण शायद दुनिया की पहली ऐसी रामायण है, जिसे बिस्मिल्लाह से शुरू किया गया हो. उर्दू अकादमी में आयोजित पुस्तक मेला में विभिन्न राज्यों की लाइब्रेरी व पुस्तकों के स्टॉल्स लगाये गये हैं. इनमें से एक स्टॉल रामपुर रजा लाइब्रेरी का है.

लाइब्रेरी के रीडिंग इंचार्ज शाहमत अली खां ने फारसी रामायण से हमें रू-ब-रू कराया. शाहमत ने बताया कि, ये बिस्मिल्लाह से शुरू होती रामायण को 1775 में लेखक सुमेर चंद द्वारा सोने के पानी से लिखा गया. साथ ही इस पांडुलिपि में शुरू के तीन पन्नों में सोने का वर्क चढ़ाया गया है. यहीं नहीं, पांडुलिपि में सुमेर चंद ने अपने हाथों से 258 चित्र भी बनाये हैं. इस ग्रंथ को तीन भागों में लिखा गया है.

लाइब्रेरी के क्लर्क मिर्जा राशिद ने बताया कि रामपुर रजा लाइब्रेरी ने कोलकाता पुस्तक मेले में तीसरी बार भागीदारी की है. राशिद ने बताया कि 675 पृष्ठों की यह रामायण केवल चार कांडों पर आधारित है. प्रत्येक कांड के आरंभ में सोने के पानी तथा कीमती पत्थरों के रंगों से बेलबूटे और नक्शो-निगार से पृष्ठ का ऊपरी भाग सजाया गया है. पांडुलिपि तीन भाग में है. पांडुलिपि का फारसी से हिंदी अनुवाद प्रो शाह अब्दुस्सलाम व डॉ वकारुल हसन द्वारा 2011 में किया गया है.

1774 में स्थापित हुई रामपुर रजा लाइब्रेरी रामपुर रजा लाइब्रेरी की स्थापना नवाब फैजुल्लाह खां द्वारा 1774 में की गयी थी. इस लाइब्रेरी में लगभग 17000 पांडुलिपियां मौजूद हैं, जो अरबी, फारसी, संस्कृत, तुर्की, पश्तो, उर्दू तथा हिंदी में हैं. इसके अलावा लाइब्रेरी में विभिन्न भाषाओं के चित्रों और ताड़पत्रों का उत्तम संग्रह है. इस संग्रह में लगभग 60 हजार मुद्रित पुस्तकें, भारतीय व विदेशी भाषाओं की पुस्तकें हैं.