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रक्तदान का शतक बनाया सेंचुरियन ब्लड डोनर्स क्लब सदस्य, नवाजे गए कई सम्मानों से

सिलीगुड़ी, इरफान-ए-आजम। समाज सेवा के मैदान में रक्तदान की पिच पर मानो वे सचिन तेंदुलकर हैं। मास्टर ब्लास्टर ने जिस तरह क्रिकेट में शतकों का शतक बनाया है, उसी तरह इन्होंने रक्तदान का भी शतक बनाया है। ये देश भर में ऐसे विरले 100 से भी कम लोगों में एक हैं, जिनके नाम यह उपलब्धि है। ऐसे लोगों की संख्या पश्चिम बंगाल राज्य में बमुश्किल 15 है और उत्तर बंगाल में वे ऐसे पहले और इकलौते हैं।

इस शख्सियत का नाम है पियूषकांति रॉय उर्फ पिंटू दा। सिलीगुड़ी शहर के मिलन पल्ली के रहने वाले पिंटू दजा के लिए रक्तदान यानी जीवनदान जुनून है। आम जरूरतमंद रोगियों की सहायता के लिए वे अब तक लगभग 500 रक्तदान शिविर आयोजित करवा कर सरकारी व गैर सरकारी ब्लड बैंकों को हजारों यूनिट रक्त मुहैया करवा चुके हैं। उनके महत्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आम लोग तो दूर, रक्त संकट की स्थिति में सिलीगुड़ी जिला अस्पताल व नॉर्थ बंगाल मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (एनबीएमसीएच) के ब्लड बैंक वाले भी उन्हें याद करते हैं।

शहर में अनेक लोगों के मोबाईल व दिलो-दिमाग में उनका नाम ‘ब्लड’ ‘खून’ ‘रक्तो’ ‘रक्तो-चोशा’ ही दर्ज है। ‘रक्तो-चोशा’ यानी रक्त चूसने वाला। समाज ने उन्हें यह अनोखा नाम दिया है। मगर, यह भी प्यार से ही है।1वे सिर्फ रक्त लेना नहीं, बल्कि देना भी जानते हैं। विश्व रक्तदाता दिवस पर 14 जून 2015 को उन्होंने 100वीं बार रक्तदान किया। इस तरह देश के प्रतिष्ठित सेंचुरियन ब्लड डोनर्स क्लब में उनका नाम शामिल हो गया। अब तक रक्तदान में उनका निजी स्कोर 103 है।

पिंटू दा जब 16-17 साल के थे और 102 के बाद कॉलेज में कदम ही रखे थे, तभी उन्होंने पहली बार रक्तदान किया। 1वह बड़े थैलेसीमिया कार्यकर्ता भी हैं। अब तक 67 थैलेसीमिया पीड़ितों की ‘स्पलीनोटॉमी’ करवा चुके हैं। इसमें सिलीगुड़ी जिला अस्पताल के जाने-माने सर्जन रहे डॉ. विवेक सरकार से उन्हें बड़ी मदद मिली। ‘स्पलीनोटॉमी’ एक ऐसी चिकित्सा है, जिसके तहत थैलेसीमिया पीड़ितों के शरीर से तिल्ली बाहर निकाल दी जाती है। इससे, बार-बार अपना रक्त बदलवाने की उनकी निर्भरता का अंतराल तीन महीने से बढ़ कर एक साल हो जाता है। यह थैलेसीमिया पीड़ितों के लिए बड़ी राहत है। पिंटू दा सतत थैलेसीमिया जागरूकता अभियान भी चलाते रहते हैं।

इसके अलावा छात्र जीवन से अधेड़ उम्र तक उन्होंने लगभग एक हजार लावारिस शवों का दाह-संस्कार भी किया हुआ है। एडवेंचर्स ट्रेकिंग के भी बड़े शौकीन हैं। पर्वतारोहण भी कर चुके हैं। सिलीगुड़ी से दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ व कन्याकुमारी तक साइकिल से यात्र का भी कमाल उनके नाम है। विद्यार्थी जीवन में स्काउटिंग में बेहतर प्रदर्शन के लिए वर्ष 1968 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन के हाथों प्रेसिडेंट अवार्ड से भी सम्मानित हो चुके हैं। पिंटू दा चार दशक से भी अधिक समय से स्वास्थ्य सेवा में रमे हुए हैं। वह शहर की अग्रणी चिकित्सकीय सहायता संस्था सिलीगुड़ी वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन की नींव डालने वालों में से हैं। कालांतर में एसोसिएशन ऑफ वॉलेंटरी ब्लड डोनर्स (कोलकाता) और वेस्ट बंगाल वॉलेंटरी ब्लड डोनर्स फोरम से जुड़े रहे। वर्ष 2014 में अपनी संस्था सिलीगुड़ी वॉलेंटरी ब्लड डोनर्स फोरम की स्थापना की। उसके बाद से अब तक उसी के माध्यम से समाज सेवा में लगे हुए हैं। वर्ष 1999 में दिल दहला देने वाली गाइसल रेल दु गाइसल में कई दिन औक रात एक करके घायलों की सेवा और मृतकों के अंतिम संस्कार में जी-जान लगा दी। वे