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होलिका दहन: जानिए कब है शुभ मुहूर्त और क्या है पूजन विधि

होलिका दहन, होली त्योहार का पहला दिन, फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. इसके अगले दिन रंगों से खेलने की परंपरा है जिसे रंगवाली होली, धुलेंडी, धुलंडी और धूलि आदि नामों से भी जाना जाता है. होली बुराई पर अच्छाई की विजय के उपलक्ष्य में मनाई जाती है. इस बार 1 मार्च को होलिका दहन का शुभ मुहूर्त है और 2 मार्च को रंगवाली होली है.

होलिका दहन फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि में करना चाहिए. 1 मार्च को सुबह 8 बजकर 58 मिनट से पूर्णिमा तिथि लग रही है लेकिन इसके साथ भद्रा भी लगा होगा. ऐसा नियम है कि भद्रा काल में होलिका दहन नहीं करना चाहिए. शाम में 7 बजकर 37 मिनट पर भद्रा समाप्त हो जाएगा. इसके बाद से होलिका दहन किया जाना शुभ रहेगा.

होलिका दहन के लिए तीन चीजों का एक साथ होना बहुत ही शुभ होता है. पूर्णिमा तिथि हो, प्रदोष काल हो और भद्रा ना लगा हो. इस साल होलिका दहन पर ये तीनों संयोग बन रहे हैं इसलिए होली आनंददायक रहेगी. इस बार होलिका दहन का शुभ मुहूर्त शाम 6 बजकर 26 मिनट से लेकर 8 बजकर 55 मिनट तक रहेगा.

भद्रा काल का वास भद्रा काल तीन जगह वास करता है. आकाश, पाताल और मृत्यु लोक. अगर भद्रा आकाश और पाताल में वास कर रहा है, फिर तो इसका ज्यादा खतरा नहीं होता. पर अगर यह मृत्यु लोक में वास कर रहा है तो गलती से भी इसमें मंगल कार्य न करें.

होलिका दहन की विधि-होलिका दहन जिस स्थान पर करना है, उसे अच्छे से साफ करें. फिर वहां गंगा जल झिड़क कर उसे शुद्ध करें. सूखी लकड़ियों का ढेर बनाएं. अग्नि समर्पित करने से पूर्व होलिका का विधिवत पूजन करें. ज्योतिषाचार्य बिनोद मिश्र के अनुसार पूजन करते वक्त पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठना चाहिए. ये पूजन किसी पण्डित से करवाना श्रेयस्कर रहता है.

पूजन सामग्री होलिका पूजन सामग्री में गोबर से निर्मित होलिका और प्रहलाद के लक्षण की तरह प्रयोग में आने वाला स्वरूप, फूलों की माला, रोली, गंध, पुष्प, कच्चा सूत, गुड़, साबुत हल्दी, मूंग, बताशे, गुलाल, नारियल, पांच या सात प्रकार के अनाज, नई गेहूं और अन्य फसलों की बालियां और साथ में एक लोटा जल रखना चाहिए. इसके अतिरिक्त बड़ी-फूलौरी, मीठे पकवान, मिठाईयां, फल आदि भी अर्पित किए जा सकते हैं. होलिका के चारों ओर सात परिक्रमा करें. होलिका दहन (जिसे छोटी होली भी कहते हैं) के अगले दिन पूर्ण हर्षोल्लास के साथ रंग खेलने का विधान है और अबीर-गुलाल आदि एक-दूसरे को लगाकर व गले मिलकर इस पर्व को मनाया जाता है.