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इंदिरा गांधी के 'हिंदू नरसंहार 1966' का सच

चुनाव के मद्देनज़र एक पुरानी तस्वीर व्हॉट्सऐप और सोशल मीडिया पर तेज़ी से शेयर की जा रही है. शुक्रवार को राजस्थान में ट्विटर पर जो भी बड़े ट्रेंड्स रहे, उनके साथ जोड़कर भी इस तस्वीर को शेयर किया गया. इस तस्वीर के साथ हिन्दी में जो संदेश लिखा है, वो है, "क्या आप जानते हैं कि मुसलमानों को ख़ुश करने के लिए 7 नवंबर 1966 के दिन इंदिरा गांधी ने गोवध-निषेध हेतु संसद भवन का घेराव करने वाले 5000 साधुओं-संतों को गोलियों से भुनवा दिया था. आज़ाद भारत में इतना बड़ा नृशंस हत्याकांड पहले कभी नहीं हुआ था." गूगल समेत अन्य सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर भी सर्च में आसानी से आ जाने वाले #Indira, #SadhuMassacre, #AntiHindu #SikhRiots जैसे कुछ हैशटैग्स के साथ भी इस तस्वीर को शेयर किया गया है. हमने जब इस तस्वीर की जाँच की तो पाया कि दक्षिणपंथी रुझान वाले कई फ़ेसबुक पन्नों ने इस तस्वीर को सिलसिलेवार ढंग से शेयर किया है. इनमें से कुछ पोस्ट हमें साल 2014-15 के भी मिले.

'संतों ने लगाई जान की बाज़ी'

1966 की इस घटना से जुड़े जितने भी पोस्ट हमें मिले, उनका लब्बोलुआब यही था कि साल 1966 में भारत के हिंदू संतों ने गो-हत्या पर प्रतिबंध लगवाने के लिए अपनी जान की बाज़ी लगाई थी लेकिन कांग्रेस की नेता इंदिरा गांधी ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया. कुछ लोगों ने इस घटना की तुलना 1984 के सिख विरोधी दंगों से भी की है और लिखा है कि भारतीय इतिहास में 1984 का ज़िक्र किया जाता है, लेकिन 1966 की बात कोई नहीं करता.

इस दुर्घटना में कितने लोगों की मौत हुई? इसे लेकर भी तमाम तरह के दावे सोशल मीडिया पर दिखाई दिए. कुछ ने लिखा है कि इस दुर्घटना में कम से कम 250 साधु-संतों की मौत हुई थी. गूगल सर्च में मिले कुछ वेबसाइट्स के पन्नों पर मृतकों की संख्या को 1000 भी बताया गया है. कई लोगों ने लिखा है कि "1966 में इंदिरा गांधी के आदेश पर पुलिस ने फ़ायरिंग की थी जिसमें हज़ारों संत मारे गए थे." अपनी पोस्ट में इन लोगों ने विकीपीडिया के एक पन्ने का भी लिंक शेयर किया है.

विकीपीडिया पेज से छेड़छाड़

'1966 का गो-हत्या विरोधी आंदोलन' नाम के इस विकीपीडिया पेज पर लिखा है कि "गो-हत्या विरोधी आंदोलन में तीन से सात लाख लोगों ने हिस्सा लिया था. जब इन लोगों ने संसद का घेराव किया तो पुलिस ने उनपर फ़ायरिंग कर दी और 375-5,000 लोग मारे गए, वहीं क़रीब दस हज़ार लोग घायल हुए." (ज़रूरी सूचना: विकीपीडिया के अनुसार, 22 नवंबर 2018 को आख़िरी बार इस पेज पर छपी जानकारी में कुछ बदलाव किए गए हैं. इस पेज पर पहले एक वाक्य लिखा हुआ था कि "इस घटना में मारे जाने वालों का आधिकारिक संख्या 7 थी." आर्टिकल में इस संख्या को बढ़ाकर अब 375 कर दिया गया है.)

विकीपीडिया पेज से छेड़छाड़

स्थानीय स्तर पर 1966 की इस घटना पर और ज़्यादा बात होने लगी जब सांगानेर के विधायक घनश्याम तिवाड़ी के आधिकारिक फ़ेसबुक पेज पर कथित तौर पर उनके द्वारा लिखा गया एक ब्लॉग शेयर किया गया. घनश्याम तिवाड़ी का नाम भारतीय जनता पार्टी के पुराने नेताओं की फ़ेहरिस्त में शामिल है. वो कई बार भाजपा के विधायक रह चुके हैं. उन्होंने राजस्थान सरकार के कई मंत्रालय भी संभाले हैं. लेकिन घनश्याम तिवाड़ी अब भाजपा का साथ छोड़ चुके हैं. क़रीब डेढ़ साल पहले उन्होंने 'भारत वाहिनी पार्टी' बना ली थी और घनश्याम तिवाड़ी अब इस दल के प्रदेश अध्यक्ष हैं. इस बार का विधानसभा चुनाव वो अपनी पार्टी से ही लड़ रहे हैं. घनश्याम तिवाड़ी ने अपने इस ब्लॉग में लिखा है, "जिस प्रकार कसाई गोमाता पर अत्याचार करता है, उसी प्रकार कांग्रेस सरकार ने उन गोभक्तों पर अत्याचार किये. सड़क पर गिरे साधुओं को उठाकर गोली मारी गई. फलतः हजारों लोग घायल हुए और सैकड़ों संत मारे गये." बहुत से लोग विकीपीडिया के अलावा घनश्याम तिवाड़ी के ब्लॉग से कुछ हिस्सों को निकालकर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं.

सभी दावों की पड़ताल वायरल तस्वीर के साथ-साथ हमने इन तमाम दावों की भी पड़ताल की. साल 1966 की बताकर जो तीन-चार तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही हैं, वो 7 नवंबर 1966 को दिल्ली में हुए हंगामे की ही पाई गईं. ग़ौर से देखें तो इन तस्वीरों में इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन के बीच पड़ने वाले लॉन और राजपथ के कुछ हिस्से दिखाई देते हैं. 7 नवंबर 1966 के दिन दिल्ली में हुए हंगामे को इतिहासकार हरबंस मुखिया भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में हुए 'सबसे पहले बड़े प्रदर्शन' के तौर पर याद करते हैं. उन्होंने बताया, "1966 में पूरे भारत में गोहत्या के ख़िलाफ़ एक राष्ट्रीय क़ानून बनाने की कोशिश की गई थी. लेकिन बहुत से लोग इसे एक बहाना और राजनीतिक साज़िश मानते थे. इसका कारण ये था कि इंदिरा गांधी ने कुछ वक़्त पहले ही सक्रिय राजनीति शुरू की थी और राजनीतिक गलियारों में लोग उन्हें 'गूंगी गुड़िया' कहने लगे थे. कांग्रेस पार्टी के भीतर भी बहुत से लोग यही मानते थे. इसलिए ये कोशिश हुई कि इस बहाने से इंदिरा को शुरुआत में ही अस्थिर कर दिया जाए." हरबंस मुखिया 7 नवंबर की घटना को कोई