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तीरंदाज दीपिका पर आधारित डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘लेडिज फर्स्ट’ का ट्रेलर जारी, ब्लॉग में लिखा, मेरे चाच

जमशेदपुर :स्वर्ण पदक विजेता महिला तीरंदाज दीपिका कुमारी के संघर्ष पर बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘लेडिज फर्स्ट’ का ऑफिशियल ट्रेलर जारी हो गया है. ट्रेलर में दीपिका के खेल जीवन के संघर्ष को दिखाया गया है. यू-ट्यूब पर इसे अब तक लाखों लोग देख चुके हैं. खुद पर बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म के बारे में दीपिका ने हफिंगटन पोस्ट पर एक ब्लॉग लिखा है, जिसमें उन्होंने अपनी निजी जिंदगी व संघर्ष के बारे में विस्तार से बताया है. दीपिका ने लिखा है, ‘17 साल की उम्र में जब मुझे विश्व की नंबर वन आर्चर होने की खबर मिली तब, वास्तव में मैं अपनी उपलब्धि को लेकर उतनी जागरूक भी नहीं थी. अपनी उपलब्धि से चार वर्ष पहले आर्चरी का मतलब मेरे लिए गरीबी दूर करना था. इस दौरान आर्चरी के बारे में मेरी समझ भी काफी कम थी.’ दीपिका आगे लिखती हैं कि वह अब ‘लेडिज फर्स्ट’ टर्म को अब वह पूरी तरह समझ गयी है़ं उनके मुताबिक, ‘लेडिज फर्स्ट कई परिदृश्य में प्रयोग होता है. लेकिन जब इसकी ज्यादा जरूरत होती है, तब इसका कभी प्रयोग नहीं होता. वर्कप्लेस, खेल और पारंपरिक पुरुष प्रधान क्षेत्रों में लेडिज फर्स्ट का प्रचलन नहीं है. लेडिज फर्स्ट का प्

ओलिंपिक में गोल्ड मेडल से कम मंजूर नहीं था

दीपिका ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि अब वह प्रसिद्ध हो चुकी थीं. मीडिया में खासी लोकप्रिय हो गयी थीं. इसी दौरान 2012 में लंदन ओलिंपिक आ गया. लोगों की अपेक्षाएं उनसे काफीबढ़ी हुई थी. गोल्ड मेडल से कुछ कम लोगों को मंजूर नहीं था. देशवासियों की आकांक्षा लेकर वह लंदन गयी थीं. उनसे कहा गया था कि देश की प्रतिष्ठा उनके खेल से जुड़ी है. अगर वह बेहतर नहीं कर पायीं तो करोड़ों भारतीयों को निराशा होगी. फिर जीत मुकम्मल हुई. वह देश के कोने-कोने में अपनी हमउम्र युवतियों से रू-ब-रू थीं. सभी दीपिका बनना चाहती थीं. युवतियों ने बताना शुरू किया कि उनकी वजह से वह आर्चरी सीख रही है़ं

मेरे चाचा मेरी मां को पीटते थे

दीपिका ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि वह रांची के पास रातू गांव की रहने वाली है़ं पिता रिक्शा चालक व मां नर्स थीं. मां की सैलरी समय से नहीं मिलती थी. घर की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर थी. उनकी मां ही सिर्फ गांव में कामकाजी महिला थीं. कम उम्र में ही उनकी सहपाठियों पर शादी करने के लिए घर वाले दबाव बनाते थे. उनके चाचा भी गांव के बने-बनाये इसी नियमों का पालन करते थे. सिर्फ कामकाजी महिला होने के कारण चाचा अक्सर मां की पिटाई करते थे. इन सब परिस्थितियों के बावजूद मेरी मां ने मुझे गांव की अन्य लड़कियों की तरह जीवन नहीं देने का फैसला किया था.

भोजन का अभाव भी झेला

दीपिका ने लिखा है कि 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने आर्चरी की शुरुआत की थी. इस दौरान ग्राउंड पर जाने के लिए पर्याप्त भोजन जुटा पाना भी उनके परिवार के लिए असंभव था. दीपिका ने बताया है कि वास्तव में उसके पिता भी लड़कियों को स्पाेर्ट्स में जाने के विरोधी थे. इसके बावजूद उन्होंने 12 साल की उम्र में घर छोड़कर आर्चरी प्रशिक्षण प्राप्त करने की ठानी. एक प्रशिक्षण केंद्र में गयीं, जहां सिर्फ लड़कों को ट्रेंड किया जाता था. मगर, उनकी आरजू-मिन्नत के बाद उसे प्रशिक्षण केंद्र के बाहर रहकर ट्रेनिंग लेने की इजाजत मिल गयी. उस वक्त दीपिका आर्चरी का ककहरा भी नहीं जानती थीं. लिहाजा उन्हें एकेडमी छोड़नी पड़ी. यहीं से इरादे मजबूत हो गये और दीपिका के दीपिका बन जाने की कहानी शुरू हो गयी.

भोजन का अभाव भी झेला