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'काॅपी-पेस्ट' करने वाले 'फेसबुकिया कवि' कविता को पहुंचा रहे नुकसान,

विश्वत सेनकविता साहित्य की एक विधा है आैर इस विधा के भी अनेक रूप हैं. एक कवि जब साहित्य के लिए कविता गढ़ता है, तो उस कविता का स्वरूप दूसरा होता है. लेकिन, जब वही कवि मंच के लिए कविता गढ़ता है, तो उसका रूप अलग होता है. मंच वाली कविता साहित्य की कविता से भिन्न होती है. एेसा इसलिए होता है, क्योंकि जो कवि साहित्य आैर मंच की कविताआें के स्वरूप में भिन्नता को बरकरार रखता है, वह दोनों की गरिमा को बनाये रखता है. वह जानता है कि मंच के सामने हजारों की संख्या में बैठने वाले यदि अच्छी कविता पर ताली बजाते हैं, कविता रोचक नहीं होने पर कवि को त्वरित आलोचना भी सहनी पड़ती है. इस तरह के भाव हास्य कवि सुनील जोगी ने बुधवार को प्रभात खबर में आयोजित होली मंगल मिलन समारोह के दौरान एक विशेष साक्षात्कार के दौरान प्रकट की.

इस विशेष साक्षात्कार में कवि सुनील जोगी ने डिजिटाइजेशन के युग में सोशल मीडिया आैर खासकर फेसबुक पर गढ़ी जाने वाली कविता को लेकर अहम बात कही है. उन्होंने कहा है कि आज सोशल मीडिया के दौर में जो कविताएं गढ़ी की जा रही हैं, उसमें अध्ययन का अभाव है. मंच शेयर करने वाले कवि फेसबुक आैर अन्य सोशल साइट्स में अपलोड की गयी कविताआें की काॅपी करते हैं आैर फिर उसके शब्द बदलकर वाह-वाही लूट लेते हैं.

उन्होंने कहा कि वे एेसा इसलिए करते हैं, क्योंकि उनमें अध्ययन का अभाव है. एेसे कवियों की काॅपी-पेस्ट वाली कविताआें से साहित्य सृजन आैर अंततः हिंदी कविता को भारी नुकसान है. सही मायने में यदि कविता करनी है, तो कवियों को अध्ययन करना चाहिए. पुस्तकों में खुद को खपाना आैर तपाना होगा. आइये हम इस वीडियो के माध्यम से यह जानते हैं कि विशेष साक्षात्कार में सुनील जोगी ने हिंदी के कवियों आैर कविता को लेकर किस तरह की चिंता जाहिर की है...