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सौंदर्य की भूमि पर नफरत का विषवमन, पत्थलगड़ी के जरिये सामाजिक समरसता को खत्म करने का प्रयास

रमेश कुमार पांडेय, खूंटी। कुदरत ने खूंटी और आसपास के इलाकों को भरपूर नैसर्गिक सौंदर्य दिया है। इसे देखने के लिए देश और दुनिया से लोग आते हैं। भले ही ये स्थान पर्यटन का दर्जा नहीं पा सके हैं, लेकिन यहां मनोरंजन व ज्ञान के भरपूर स्थान मौजूद हैं। पंचघाघ, दशम फॉल, रानी फॉल, हिरणी फॉल आदि प्रकृति प्रदत्त कृतियां हैं, जिन्हें देखकर यहां आने वालों को सुखद अनुभूति होती है। दुर्भाग्य से अब यहां पत्थलगड़ी के जरिए सामाजिक समरसता को खत्म कर नफरत फैलाने का प्रयास चल रहा है। सदियों से सुख-दुख के भागीदार रहे लोगों को जातीयता-स्थानीयता की ओट लेकर जुदा करने का प्रयास हो रहा है। आदिवासियों को मालिकाना हक दिलाने का सब्जबाग दिखाकर उन्हें स्थानीय बताया जा रहा है, जबकि सदानों को बाहरी करार दिया जा रहा है। इस प्रयास से समाज में विभाजन की रेखा सी खिंचने लगी है।

इस कारण आदिवासी बहुल क्षेत्र में रहने वाले गैर आदिवासियों को भविष्य की चिंता सता रही है। विगत रविवार को खूंटी और पश्चिमी सिंहभूम की सीमा पर स्थित कोचांग गांव में हुए पत्थलगड़ी समारोह में आए अतिथियों के बयान, उनके तेवर और अंदाज कुछ ऐसे लगे जैसे सदानों ने आदिवासियों की हकमारी कर ली हो और वही उनके असली दुश्मन हैं। इस दौरान सामाजिक समरसता को खंडित करने के लिए लगातार दिकू शब्द का प्रयोग किया गया। आदिवासियों को उकसाया गया। डॉ. जोसेफ पूर्ति, शंकर महली और उनके अन्य सहयोगियों की बातें कुछ ऐसे ही संकेत दे रही थीं। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि गैर आदिवासी राज्य में मालिक बने हैं, जबकि यहां के असली मालिक आदिवासी हैं। इस पर लोगों का कहना है कि यह समाज में विद्वेष फैलाने सरीखी बात है। संविधान की दुहाई देने वाले गुमला को लेकर भारत में गांधी-इरविन समझौते का हवाला दे रहे हैं, जबकि 70 साल पहले देश आजाद हो गया और वह समझौता अब प्रासंगिक नहीं रहा।

पत्थलगड़ी का बन रहा है खास कॉरीडोर

पत्थलगड़ी का एक ऐसा कॉरीडोर बन रहा है जहां मानकी-मुंडा की बहुलता है। पूर्वी सिंहभूम, खरसांवा-सरायकेला, बूंडू, तमाड़, अड़की, खूंटी, मुरहू तोरपा और रनिया होते हुए कामडारा के कुछ भाग में पत्थलगड़ी का अभियान चल रहा है। अभियान चलाने वालों का उद्देश्य और प्रयास यह है कि जमशेदपुर से चाईबासा तक गुजरी सड़क के बाएं हिस्से में अपना प्रभाव जमाया जाए। यही वह हिस्सा है, जो मुंडा और सरना आदिवासी बहुल है। इसी हिस्से में अंग्रेजों को नाको चने चबाने पड़े थे। धरती आबा बिरसा मुंडा और उनके सेनापति गया ¨सह मुंडा के हाथों। यही वजह है कि पत्थलगड़ी अभियान के संचालक धरती आबा के पक्ष में नारे लगाकर लोगों की भावनाओं को भुनाने का प्रयास कर रहे हैं।

नशे के सौदागर, खनन माफिया व नक्सलियों का गठजोड़ बन रहा नासूर

खूंटी जिले में पत्थलगड़ी अभियान को लेकर जो चर्चा और आशंका व्यक्त की जा रही है उसके अनुसार यहां नशे के सौदागर, बालू, पत्थर खनन एवं लकड़ी माफिया एवं माओवादियों का गठजोड़ इस अभियान को संचालित करने में अहम भूमिका निभा रहा है। पुलिस के पदाधिकारियों और खुफिया तंत्र की सूचना भी यही कहानी बयां कर रही है। दरअसल, इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हो रही अफीम की खेती अब शासन-प्रशासन के लिए नासूर बन रही है। अफीम के सौदागर पैसों का खेल खेलने में लगे हैं। उनके लिए राष्ट्रहित से इतर पैसा ही सर्वोपरि है। पैसों का प्रलोभन देकर वे लोगों को अपने पक्ष में कर रहे हैं। हालांकि इस खेल को स्थानीय लोग समझ नहीं पा रहे हैं। दरअसल, अफीम की खेती से यहां की जमीन के बंजर होने का खतरा है, वहीं नदियों और नालों के पानी का अत्यधिक उपयोग जल संकट को आमंत्रित करने जैसा है। दूसरी ओर शराब के अवैध कारोबारी नशा बढ़ाने के लिए महुआ और हडि़या में भी अफीम मिलाने लगे हैं, यह मुनाफे के लिए जीवन से खिलवाड़ करने के समान हैं।

नशे के सौदागर, खनन माफिया व नक्सलियों का गठजोड़ बन रहा नासूर

गौरतलब है कि इन क्षेत्रों में पुलिस जहां-जहां अफीम की खेती को बर्बाद करने पहुंचती है वहीं विरोध के स्वर गूंज रहे हैं। खास बात यह कि जिन गांवों में विरोध हो रहा है वे सभी गांव प्रतिबंधित माओवादियों या पीएलएफआइ के गढ़ रहे हैं। नशे के अवैध कारोबारी इन संगठनों को धन मुहैया करा रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप गांवों के कुछ लोग जगह-जगह बैरियर और मचान लगाकर दिन-रात पहरेदारी करते हैं और किसी बाहरी या पुलिस के यहां आने-जाने की सीधी सूचना अपने आकाओं को भेजकर उन्हें सावधान करते हैं। खूंटी प्रखंड के कांकी और अड़की प्रखंड के कुरुंगा गांव में पुलिस को बंधक बनाने के पीछे ऐसे ही तत्वों का हाथ था। यहां बालू, पत्थर और लकड़ी ढोने वाले वाहनों को रोकने और अवैध कारोबार रोकने का दावा भी किया जाता है। दलील यह भी दी जाती है कि यह पहरेदारी अपराधियों और नक्सलियों को गांवों में आने से रोकने की कोशिश का हिस्सा है। लेकिन इसकी वास्तविकता की पोल अब पोल खुल रही है। पत्थलगड़ी करने वाले कानून की जानकारी देने और विकास के लिए आदिवासी समाज को एकजुट करने की दलील दे रहे हैं, लेकिन जिन गांवों में पत्थलगड़ी हो चुकी है, वहां के ल