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जिन्होंने पहुंचा दिया सलमान को जेल जानिए उस विश्नोई समाज के अद्भुत रिवाजों को

जिस बिश्नोई समाज ने काले हिरण के शिकार की हत्या करने के अपराध पर फिल्मस्टार सलमान खान और अन्य के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी और अपराध की सजा दिलाई। वन और वन्यजीवों के लिए यह उनकी पहली लड़ाई नहीं है। इससे पहले भी बिश्नोई समाज के 300 से अधिक लोग पेड़ों को बचाने के लिए अपनी जान की कुर्बानी दे चुके हैं।

इतना ही नहीं बिश्नोई समाज के कई धार्मिक क्रिया-कलाप प्रकृति के संरक्षण को ध्यान में रखकर किए जाते हैं। बाकी हिंदुओं से अलग अंतिम संस्कार की प्रथा होना भी प्रकृति के संरक्षण के लिए उठाया गया इनका बड़ा धार्मिक कदम है।

बिश्नोई समाज के धार्मिक गुरु हैं गुरु जम्भेश्वर। यह समाज इन्हीं के बताए गए नियमों का पालन करता है। इनके बताए गए नियमों में से एक नियम है वन संरक्षण और वन्य जीव संरक्षण। इसी कारण बिश्नोई समाज के लोग किसी परिजन की मृत्यु हो जाने पर उसके शव को जलाते नहीं हैं बल्कि दफनाते हैं। इसके पीछे तर्क है कि ऐसा करने से लकड़ी की बचत होगी और पर्यावरण को नुकसान कम होगा। गौरतलब है कि राजस्थान एक मरुस्थल है, जहां पहले से ही पेड़ों की संख्या कम है। ऐसे में दाह संस्कार के लिए लकड़ी काटने पर पर्यावरण को और नुकसान होगा।

इस तरह करते हैं अंतिम संस्कार

प्राप्त जानकारी के मुताबिक, बिश्नोई समाज के लोग मृत परिजन के शव को अपनी ही जमीन में ही दफनाते हैं। ऐसा करते समय शव का सिर उत्तर दिशा की तरफ रखा जाता है। मृतक के शरीर पर कफन के अलावा कोई अन्य आभूषण नहीं रखा जाता है। फिर शव पर मिट्टी डालकर गड्ढे को भर दिया जाता है। इसके बाद उस मिट्टी के ऊपर बाजरी डाली जाती है और देह को कंधा देनेवाले लोग उसी गड्ढे के ऊपर स्नान करते हैं।

इस तरह करते हैं अंतिम संस्कार

मृतक को दफनाने के बाद उसका पसंदीदा भोजन कौओं के खाने के लिए रख दिया जाता है। इस प्रक्रिया को कगोल देना कहते हैं। मान्यता है कि दाह संस्कार के बाद भी आत्मा घर में ही होती है। फिर तीसरे दिन विधि-विधान के साथ अंतिम कगोल दिया जाता है। इसके बाद अन्य रस्म रिवाज चलते रहते हैं जिनमें मुंडन भी प्रमुख है।

इस तरह बदले कुछ संस्कार :-बिश्नोई समाज के लोग राजस्थान के अलावा हरियाणा में भी बड़ी संख्या में रहते हैं। साथ ही पंजाब, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी इस समाज के लोग बसते हैं। जो लोग राजस्थान को छोड़कर दूसरे राज्यों में बसे, उनमें से कुछ ने छोटे घर, सामाजिक प्रभाव और हिंदुओं के लिए कब्रिस्तान की कमी के कारण शवों को जलाने का संस्कार अपनाया। ये हैं बिश्नोई समाज के धर्म स्थल :-जस्थान में जोधपुर तथा बीकानेर में बड़ी संख्या में इस संप्रदाय के मंदिर और साथरियां बनी हुई हैं। मुकाम नामक स्थान पर इस संप्रदाय का मुख्य मंदिर बना हुआ है। समाज के गुरु, गुरु जम्भेश्वर का जन्म 1451 में हुआ था। बीकानेर जिले मे स्थित समरथल बिश्नोई समाज का सबसे बड़ा तीर्थ स्थल है। वहीं मकाम में गुरु जम्भेश्वर का समाधि स्थल है। हर साल फाल्गुन की अमावस्या तिथि को यहां एक बहुत बड़ा मेला लगता है, जिसमें हजारों लोग भाग लेते हैं। इस संप्रदाय के अन्य तीर्थस्थानों में जांभोलाव, पीपासार, संभराथल, जांगलू, लोहावर, लालासार आदि तीर्थ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनमें जांभोलाव बिश्नोईयों का तीर्थराज तथा संभराथल मथुरा और द्वारिका