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फाइलों में ही दौड़ रहीं गंगा सफाई की तमाम योजनाएं

पटना :कभी मोक्षदायिनी कही जाने वाली मां गंगा अपने ही पुत्रों से परेशान है. उन पुत्रों से जिनके ऊपर उनके रखरखाव की जिम्मेवारी है और उनसे भी जो उनको अपनी मां मानते हैं. पिछले 30-32 वर्षों के दौरान गंगा नदी के संरक्षण व पुनरुद्धार पर अरबों रुपये खर्च हुए, लेकिन हालत नहीं सुधरे. जुलाई 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नमामि गंगे योजना की शुरुआत के बाद कुछ उम्मीद जगी, लेकिन इससे जुड़ी बिहार की परियोजनाओं के विलंब संचालन से उम्मीदें टूटती दिख रही हैं. हालत यह है कि पटना सहित तमाम शहरों में गंगा नदी की हालत खराब है .

एसटीपी को करना होगा लंबा इंतजार : गंगा नदी को प्रदूषित होने से बचाने के लिए बड़ी संख्या में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी) का निर्माण किया जा रहा है. लेकिन, इनके कार्य की रफ्तार को देखते हुए अभी कई वर्षों तक इंतजार करना पड़ सकता है. ठोस कचरे की सफाई के लिए सिर्फ पटना में ट्रैश स्कीमर लगा है. शवदाह गृहों की स्थिति भी बेहद खराब है. राजधानी के ही तीन में से दो विद्युत शवदाह गृह खाजेकला और गुलबी घाट लंबे समय से खराब हैं. गंगा एक्शन प्लान की समीक्षा को लेकर जिला स्तर पर कमेटियां बनायी जानी थी, लेकिन अधिकांश जिलों में कमेटियों का पता ही नहीं है. श्रद्धालुओं से जोड़ने पर भी ध्यान नहीं

गंगा नदी को साफ रखने के लिए श्रद्धालुओं को इससे भावनात्मक रूप से भी जोड़ने की योजना पर भी सरकार का ध्यान नहीं है. लंबे समय बाद राजधानी में गंगा आरती तो शुरू हुई, लेकिन जल पर्यटन के लिए चलाया जाने वाला एमवीआर विहार नौका महीनों से बंद पड़ी हुई है. गंदगी की वजह से ही कभी गंगा नदी की खासियत रही डॉल्फिन (सोंस) भी अब दिखाई नहीं देते. पहले तो राजधानी में आस पास डॉल्फिन छलांग मारते दिख जाते थे. श्रद्धालुओं को नदी में पूजन सामग्री फेंकने से रोकने के लिए डस्टबीन लगाये जाने का भी प्रावधान था, लेकिन वो भी किसी घाट पर दिखाई नहीं देता. नमामि गंगे प्रोजेक्ट का हाल परेशानी जमीन को लेकर फंसा बेगूसराय, मुंगेर व हाजीपुर में तीन एसटीपी व दस आईपीएस का मामला सरकार का जवाब हालांकि राज्य सरकार का कहना है कि जमीन की दिक्कत नहीं है. प्रोजेक्ट का संशोधित प्राक्कलन एनएमसीजी से मंजूर होते ही जमीन उपलब्ध हो जायेगी. परेशानी

बक्सर सीवरेज सिस्टम व एसटीपी योजना की बेहद धीमी रफ्तार सरकार का जवाब इस प्रोजेक्ट में चीन की एजेंसी ट्राइ टेक जुटी है. इसी एजेंसी को हाजीपुर व बेगूसराय का भी कांट्रैक्ट मिला था, जिसे धीमी रफ्तार के चलते हटा दिया गया. बक्सर को लेकर भी स्पष्टीकरण पूछा गया है. अशक्त स्टेट प्रोग्राम मैनेजमेंट ग्रुप सभी प्रोजेक्टस को बेहतर तरीके से लागू करने के लिए स्टेट प्रोग्राम मैनेजमेंट ग्रुप (एसपीएमजी) का गठन किया जाना था, लेकिन कर्मियों के अभाव में यह ग्रुप अशक्त है. इसके 19 पदों के लिए 05 जनवरी 2018 को टेंडर हुआ था. प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टिंग की बहाली होने तक बुडको के इंजीनियर ही इस कार्य को देखेंगे. इंजीनियरिंग संगठन को एकीकृत करने के लिए जल पर्षद, डूडा व बूडा के बुडको में विलय का प्रस्ताव भी राष्ट्रपति के पास विचाराधीन है.

पटना रिवर फ्रंट डेवपलमेंट की धीमी रफ्तार सरकार का जवाब 6.6 किमी की लंबाई के 20 घाटों को जोड़ कर पैदल पथ बनाना था. लेकिन गंगा पाथवे की वजह से चार घाटों का निर्माण रुक गया. इसी दौरान पैदल पथ के रास्ते में टेकारी महाराज, ट्रेनिंग कॉलेज सहित कई ऐतिहासिक भवन आ गये जिसके चलते रास्ता बदलना पड़ा. इसी तरह, गुलबी घाट पर जमीन की बजाय ऊपरी मार्ग से पाथवे ले जाना पड़ा. इसके चलते परियोजना लागत बढ़ कर 329.40 करोड़ रुपये हो गयी है. संशोधित एस्टीमेट को मंजूरी के लिए केंद्र को भेजा गया है. इसके लिए छह अतिरिक्त महीने की जरूरत होगी. परेशानी बेऊर व करमलीचक एसटीपी की धीमी गति सरकार का जवाब राजधानी के सैदपुर, बेऊर व करमलीचक में एसटीपी का निर्माण किया जा रहा है, जिसमें बेऊर व करमलीचक के निर्माण की गति धीमी है. जनवरी 2018 तक बेऊर एसटीपी का 21 % काम होना था, जबकि 17.73 % ही हुआ. इसी तरह, करमलीचक एसटीपी के 21 % काम के मुकाबले महज 18% ही काम हो सका है. बेऊर व सैदपुर के सीवरेज नेटवर्क का काम ठीक चल रहा है.