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विरोध की राजनीति का नफरत ही सबसे बड़ा मूल्य है

कृष्ण प्रताप सिंह।राजनीतिक चेतना के लिहाज से देश के शीर्षस्थ राज्यों में से एक बिहार के दरभंगा जिले में राजनीतिक वैमनस्य ने गत गुरुवार को क्रूर हिंसा का जैसा नया अध्याय लिखा, उसे बहुत दिनों तक भुलाया नहीं जा सकेगा। जिले के भदहा गांव में एक चौराहे के नामकरण के सवा साल पुराने मामूली से विवाद को लेकर टकराव पर आमादा राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद कार्यकर्ताओं ने भाजपा के नेता तेजनारायण यादव के सत्तर वर्षीय पिता रामचंद्र यादव पर हमलाकर उन्हें तलवार से काट डाला।

खबरों के अनुसार कोई सवा साल पहले गांव के कुछ भाजपा समर्थकों ने उक्त चौराहे का नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर रख दिया था। राजद कार्यकर्ता तभी से उनसे भन्नाए हुए थे और वे चौराहे का नामकरण अपने नेता लालू प्रसाद यादव के नाम पर करना चाहते थे। कहते हैं कि गुरुवार को वे अपने इसी एलान पर अमल करने वहां पहुंचे और प्रधानमंत्री के प्रति अपशब्दों का इस्तेमाल करने लगे तो रामचंद्र यादव से रहा नहीं गया। वे उन्हें यह समझाने को आगे बढ़े कि विरोध की भी एक तमीज होती है तो इसकी कीमत अपनी जान से चुकाने को अभिशप्त हो गए।

अपना वैमनस्य वैमनस्य नहीं...

यकीनन राजद कार्यकर्ता उन पर तलवार चला रहे होंगे तो असहिष्णुता व वैमनस्य की वह राजनीति मगन होकर खिलखिला उठी होगी, जिसे काबू करने के ईमानदार प्रयासों की इधर बलि चढ़ा दी गई है। पार्टियां और सत्ताएं इस बाबत दृष्टिकोण तय करने में भी अपने निहित स्वार्थों से परहेज नहीं बरततीं। मुंह खोलने और बात को जुबां पर लाने से पहले गौर से देखती हैं कि मरने और मारने वालों में कौन अपना है और कौन पराया। जिसकी लाश गिरी है, वह पराया हुआ तो असहिष्णुता और वैमनस्य की बढ़त को तो क्या अस्तित्व को भी स्वीकार नहीं करतीं। जैसे उन्हें अपनों का भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार नहीं लगता, अनैतिकताएं अनैतिकताएं नहीं लगतीं, अपनों का फैलाया वैमनस्य भी वैमनस्य नहीं ही नजर आता। पिछले दिनों हम उनका यह दोहरापन कई मौकों पर देख चुके हैं। ऐसे में क्या आश्चर्य कि देश की राजनीति से वैमनस्य की भावनाओं के उन्मूलन के लिए वांछित एकजुटता अभी तक अस्तित्व में नहीं आ सकी है। वह जब भी अस्तित्व में आने की कोशिश करती है, उसकी भ्रूण हत्या कर दी जाती है।

Publish Date:Thu, 22 Mar 2018 12:30 PM (IST) विरोध की राजनीति का नफरत ही सबसे बड़ा मूल्य है दुनि

अकारण नहीं कि हमारे राजनीतिक मैदानों में आजकल स्वस्थ लोकतांत्रिक बहसों की गलियां निरंतर अवरुद्ध होती जा रही हैं और परस्पर संवाद का माहौल तो वहां एकदम से नहीं रह गया है। वहां के ज्यादातर ‘खिलाड़ियों’ के लिए लोकतंत्र कोई जीवनदर्शन न होकर हर हाल में सत्ता के खेल की ऐसी सुविधा है, जो दूरदर्शी नीतियों, कार्यक्रमों, उसूलों और सिद्धांतों की राह को अप्रासंगिक कर देती है।

Publish Date:Thu, 22 Mar 2018 12:30 PM (IST) विरोध की राजनीति का नफरत ही सबसे बड़ा मूल्य है दुनि

अंग्रेजी के प्रसिद्ध साहित्यकार शेक्सपियर तो सदियों पहले समझा गए हैं- नाम में कुछ रखा ही नहीं है। और तो और राजद जैसी खुद को समाजवादी मानने वाली पार्टियों के आराध्य समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने भी हिदायत दे रखी है कि किसी नेता के निधन के तीन सौ साल बाद तक न उसके नाम पर कोई नामकरण किया जाए, न उसकी मूर्ति लगाई जाए और न स्मारक बनाया जाए। इन तीन सौ सालों में वक्त खुद यह फैसला कर डालेगा कि वह नेता इस लायक था भी या नहीं।अपने जीते जी अपना नाम अमर कर डालने की सोच रखने वाले नेताओं ने डॉ. लोहिया की हिदायत में निहित समझदारी का विकास होने दिया होता तो दरभंगा में वह होता ही नहीं जो हुआ। क्योंकि तब चौराहे को नरेंद्र मोदी चौक बनाने वालों को भी अपने किए की व्यर्थता पता होती और मोदी का नाम हटाकर लालू का नाम चस्पां करने हेतु लाश गिराने वालों को भी।

नफरत ही सबसे बड़ा मूल्य:-लेकिन क्या कीजिएगा, न सिर्फ हमारे देश, बल्कि दुनिया भर का इतिहास गवाह है कि जब भी राजनीति सृजन व निर्माण के मूल्यों से नाता तोड़ लेती है, नफरत ही उसका सबसे बड़ा मूल्य हो जाती है। अपने देश की राजनीति की बात करें तो अगर वह वैमनस्य के बजाय सौमनस्य की राह चलती तो क्या सत्ता और क्या विपक्ष, सारे राजनीतिक दल एक से बढ़कर एक स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों व परंपराओं की प्रतिष्ठा की मित्रतापूर्ण प्रतिद्वंद्विता कर रहे होते।चूंकि ऐसा नहीं है इसलिए वे, और तो और राजनीति भी राजनीति की तरह नहीं कर रहे। आखिरकार उनके इस आचरण को राजनीतिक कैसे करार दिया जा सकता है कि त्रिपुरा में वामपंथियों के चुनाव हारते ही उन्हें पहला ख्याल उनके नेता ब्लादिमीर लेनिन की प्रतिमाओं से दुश्मनी निकालने का आता है। इतना ही नहीं, उनके जो विरोधी खुद को उनके इस कृत्य से उद्वेलित बताते हैं, वे भी उन्हीं की राह पर चलने लग जाते हैं और रामास्वामी पेरियार व श्यामाप्रसाद मुखर्जी से लेकर बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर व महात्मा गांधी तक की मूर्तियों से हिसाब-किताब चुकता करने लग जाते हैं। उनका काम खत्म होता है तो सिर