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बिहार : बुजुर्ग सड़क पर, युवा सोशल मीडिया पर ही चला रहे आंदोलन

पटना :18 मार्च (रविवार) को जेपी क्रांति की 44वीं वर्षगांठ थी. वर्ष 1974 में इस दिन छात्र-युवाओं ने भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और गलत शिक्षा नीति जैसे सामाजिक मुद्दों के खिलाफ बड़ी लड़ाई की शुरुआत की थी. इस दिन राज्य भर से आये छात्र-युवाओं ने राजधानी में विधानमंडल का घेराव कर सरकार को अपनी ताकत का एहसास कराया था. आंदोलन को बाद में लोकनायक जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व मिला, जिन्होंने देश में बड़ा बदलाव कायम किया. इस आंदोलन की 44वीं वर्षगांठ पर रविवार को संपूर्ण क्रांति मंच के बैनर तले आंदोलन से जुड़े रहे बुजुर्गों ने करीब डेढ़ घंटे का सांकेतिक प्रदर्शन किया. उनका प्रदर्शन उसी भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों के खिलाफ थी.

सशक्त नेतृत्व का अभाव

जेपी आंदोलन की 44वीं वर्षगांठ ने दिलायी बदलाव में युवाओं की भूमिका की याद , सशक्त नेतृत्व के अभाव में सामाजिक मुद्दों को लेकर एकजुट नहीं हो पा रहा युवा

मीडिया पर ही क्रांति कर रहे युवा

बुद्धिजीवी वर्ग का मानना है कि युवाओं की हिस्सेदारी के बगैर बड़ी क्रांति नामुमकिन है. लेकिन, इस वक्त युवाओं का बड़ा हिस्सा सामाजिक मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरने की बजाय सोशल मीडिया पर क्रांति करने में अधिक विश्वास रखता है. ऐसे लोग ज्ञान भरे लंबे-चौड़े पोस्ट लिख कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं. युवाओं का समूह कभी सड़क पर आंदोलन के लिए उतरता भी है तो अहिंसा की जगह उनका विश्वास हिंसा पर अधिक देखा जाता है. पुराने समाजवादी घंटों, दिनों, महीनों तक उपवास पर डटे रह कर अहिंसक क्रांति में विश्वास रखते थे, जबकि आज के युवा अपनी बातों को मनवाने के लिए हिंसा पर उतर आते हैं. उनमें धैर्य की खासी कमी देखी जाती है. मुद्दों पर जोर नहीं : हाल में हुए युवाओं के प्रदर्शन को गौर करें तो रेलवे की नौकरी के नियम, एसएससी परीक्षा, छात्रसंघ चुनाव आदि मुद्दों को लेकर ही युवा सड़क पर दिखे. सामाजिक मुद्दों को लेकर उनका कोई बड़ा जुटान शायद ही देखने को मिला. यह लड़ाई सत्ता-समाज परिवर्तन को लेकर कम, उनके व्यक्तिगत जरूरतों को लेकर अधिक कही जा सकती है. हां, महिलाओं के शांतिपूर्ण प्रभावी प्रदर्शनों ने सर

-रणधीर कुमार सिंह, समाजशास्त्री अन्ना आंदोलन भी लक्ष्य से भटका

वर्ष 1974 के बाद वर्ष अप्रैल, 2011 में जन लोकपाल विधेयक को लेकर समाजसेवी अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुआ आंदोलन भी प्रभावी कहा जा सकता है. इस आंदोलन में स्वत: स्फूर्त युवाओं की भूमिका देखने को मिली. आंदोलन में अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण व बाबा रामदेव सहित कई चेहरे उभर कर सामने आये. आंदोलन के प्रभाव से तत्कालीन मनमोहन सरकार पर जबर्दस्त दबाव पड़ा. लेकिन, बाद में इससे जुड़े चेहरे अलग होते गये और आंदोलन लक्ष्य से भटक गया.

-रणधीर कुमार सिंह, समाजशास्त्री अन्ना आंदोलन भी लक्ष्य से भटका

पुनर्जागरण : मध्यकाल में यूरोप के सांस्कृतिक आंदोलन को पुनर्जागरण कहा जाता है. 14वीं से 17वीं शताब्दी के बीच यह आंदोलन इटली से प्रारंभ होकर पूरे यूरोप में फैल गया. इसमें युवाओं की बड़ी भूमिका रही. अमेरिकन क्रांति : 18वीं शताब्दी में 13 क्षेत्रों ने साथ मिल कर ब्रिटेन साम्राज्य से अलग होकर संघर्ष किया. इस क्रांति के चलते 1776 में संयुक्त राज्य अमेरिका के स्वतंत्रता की घोषणा की गयी. रूस की क्रांति : 1917 की रूसी क्रांति इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी. इसने निरंकुश जारशाही शासन ही नहीं, बल्कि पूंजीपतियों की आर्थिक व सामाजिक सत्ता को समाप्त कर विश्व में मजदूरों की सत्ता स्थापित की.