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क्यों ना बात करें? ये हमारी बात है, इसमें शर्म कैसी…

पटना [काजल]। मिस वर्ल्‍ड मानुषी छिल्लर भले ही मासिक धर्म को स्त्री की पहचान व गर्व की बात बताएं, लेकिन इसे लेकर जागरूकता का आज भी अभाव है। ज्यादातर बच्चियां और महिलाएं शर्म की वजह से इस विषय पर खुलकर बात नहीं करतीं। अपने ही शरीर के हिस्से में होने वाले बदलाव में किसी प्रकार की परेशानी हो तो उसे छुपाती हैं। मासिक धर्म या उससे संबंधित बातों पर चर्चा करने से कतराती हैं।इसकी वजह से वे कई गंभीर बीमारियों की शिकार हो जाती हैं। इस विषय को लेकर जागरूक करती अक्षय कुमार और सोनम कपूर की हालि

इस विषय को लेकर जागरूक करती अक्षय कुमार और सोनम कपूर की हालिया फिल्म 'पैडमैन’ को लोगों ने खूब पसंद किया। इसने लोगों की मानसिकता बदली है। पैडमैन की तर्ज पर कई संस्थाओं और कंपनियों द्वारा सस्ते पैड बनाए जा रहे हैं। इसके लिए अभियान भी चलाया जा रहा है। लेकिन, गांव-गांव में महिलाओं और बच्चियों को जागरूक करने में अभी इसमें वक्त लगेगा। क्योंकि आज भी ये मानसिकता है कि उन दिनों होने वाली परेशानियों को शर्म की वजह से बताना नहीं, पैड खरीदने में संकोच, या दुकानदार भी जब पैड देता है तो उसे काली पॉलिथिन में डालकर, जैसे वह कोई अछूत सी चीज हो। ये मानसिकता आज भी कायम है और अभी इसे बदलने में शायद बहुत वक्त लगेगा।

क्या है मासिक चक्र

महिलाओं में होने वाला मासिक चक्र एक शारीरिक प्रक्रिया है। 10 से 15 साल के आयु की लड़की का अंडाशय हर महीनेएक विकसित डिंब उत्पन्न करना शुरू कर देता है। वह अंडा फैलोपियन ट्यूब के द्वारा नीचे जाता है जो अंडाशय को गर्भाशय से जोड़ती है। जब अंडा गर्भाशय में पहुंचता है तो वह रक्त और तरल पदार्थ से गाढ़ा हो जाता है और योनिमार्ग से निकल आता है, इसी स्राव को मासिक धर्म या पीरियड्स या माहवारी कहते हैं।

जागरूकता का अभाव

यह चक्र हर महीने चलता रहता है। यह चक्र सामान्यत: 28 या 32 दिनों का होता है। इन दिनों महिलाओं और लड़कियों को साफ-सफाई का खास ध्यान रखना चाहिए। लेकिन, भारत जैसे विकासशील देश में माहवारी पर खुलकर बात करने से आज भी महिलाएं और लड़कियां कतराती हैं। इसी वजह से माहवारी और उस दौरान क्या उपयोग करें जिससे सेहत पर असर ना पड़े, इसको लेकर जागरूकता का नितांत अभाव है, जो स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का कारण बनता है

जागरूकता का अभाव

डॉक्टर्स का कहना है कि शर्म और संकोच, जानकारी के अभाव की वजह से करीब 70 फीसद महिलाएं तरह-तरह की बीमारियों से ग्र्रसित हो रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार गांवों-कस्बों के स्कूलों की बच्चियां पीरियड्स के दौरान पांच दिनों तक स्कूल नहीं जातीं। यही नहीं, करीब 23 फीसद बच्चियां माहवारी शुरू होने के बाद अपनी पढ़ाई छोड़ देती हैं। इसे ध्यान में रखकर केंद्र सरकार ने सातवीं और आठवीं क्लास की बच्चियों के लिए साल में 150 रुपये देने की योजना शुरू की है, ताकि वे अपने लिए सेनेटरी नैपकिन खरीद सकें। इसके अलावे बिहार सरकार ने भी मिडिल स्कूल और हाई स्कूल की छात्राओं को मुफ्त सेनिटरी पैड्स देने की योजना भी शुरू की है।

आज भी करतीं बोरा, राख और पत्ते का इस्तेमाल :-बिहार में ग्रामीण और स्लम इलाके कीमहिलाओं के बीच आज भी एेसी चीजें उपयोग की जाती हैं जिसे सुनकर आपको आश्चर्य होगा। उन दिनों साफ-सफाई के लिए जागरूकता फैला रही सामाजिक संस्था में कार्यरत आकांक्षा भटनागर ने बताया कि जब मैं गावों में गई तो मुझे देखकर आश्चर्य हुआ कि अशिक्षित महिलाएं, जिनके पास पर्याप्त सुविधाएं नहीं, वो गंदे कपड़े, गंदे बोरे के टुकड़े, बड़े-बड़े पत्ते, और कपड़े के बीच में राख भरकर उसे उपयोग में लाती हैं।यह देखकर ऐसा लगा कि हम स्वच्छता और जागरूकता की जो बातें करते हैं वो कितनी बेमानी हैं। उनके सेहत के लिए ये सब कितना खतरनाक है, इसका अंदाजा उन्हें नहीं। जबतक इन महिलाओं को ये बताया नहीं जाएगा कि वो अपने सेहत से खिलवाड़ कर रही हैं, कैंसर और बच्चेदानी की गंभीर बिमारियों को बुलावा दे रहीं हैं, ऐसा होता रहेगा। सामाजिक कार्यकर्ता रीतू चौबे ने बताया कि ग्र्रामीण तबके की महिलाओं का कहना है कि लड़कियों या औरतों को हर महीने साफ कपड़े उपयोग करने की क्या जरूरत, वो तो गंदे ही हो जाते हैं और उन्हें फेंकना ही पड़ता है। जब उनसे पूछा गया कि सेने