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आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 की रिपोर्ट, देश से ज्यादा बिहार की विकास दर...देखें आंकड़े

पटना : बिहार विधानमंडल का बजट सत्र सोमवार को शुरू हुआ. पहले दिन वित्तीय वर्ष 2017-18 की आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट पेश की गयी. सदन पटल पर राज्य की 12वीं आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट रखने के बाद वित्त मंत्री सुशील कुमार मोदी ने पत्रकारों से कहा कि आर्थिक क्षेत्र में बिहार लगातार आगे बढ़ रहा है. राज्य की सकल घरेलू विकास दर 2016-17 में बढ़कर 10.3% तक पहुंच गयी, जो 2015-16 के दौरान 7.5% थी.

वर्ष 2017-18 के दौरान इसके 10.5% रहने का अनुमान है. यह राष्ट्रीय विकास दर 7% से ज्यादा है. पिछले पांच वर्ष के दौरान राज्य की औसत विकास दर 10% से ज्यादा रही है. दो अंकों में विकास दर को बनाये रखने के पीछे मुख्य रूप से दो कारण हैं. पहला, पब्लिक सेक्टर में पूंजी निवेश और दूसरा, अर्थव्यवस्था से जुड़े मानकों को जांचने वाले कई महत्वपूर्ण बिंदुओं में सुधार होने के साथ-साथ एग्रीकल्चर सेक्टर में मूलभूत सुधार होना है. राजनीतिक स्थिरता के कारण भी आर्थिक स्तर पर राज्य मजबूत हुआ है. पिछले एक दशक की विकास दर की बात करें तो 2004-05 से 2014-15 के बीच राज्य की आय में 10.1%की औसत वार्षिक दर से बढ़ोतरी हुई है. यह आर्थिक मजबूती का सबसे बड़ा सूचक है.

इस आर्थिक सुदृढ़ीकरण का सीधा असर प्रति व्यक्ति आय पर भी देखने को मिला है. राष्ट्रीय औसत के मुकाबले राज्य की प्रति व्यक्ति आय 2015-16 के दौरान 31.6% थी, जो 2016-17 में बढ़कर 32.4% हो गयी. इसमें एक फीसदी की वृद्धि दर्ज की गयी है. 2011-12 के दौरान यहां प्रति व्यक्ति आय 29,178 रुपये हुआ करती थी, जो 2016-17 में बढ़कर 38, 546 रुपये हो गयी. इसी तरह राज्य सकल घरेलू उत्पाद (एसजीडीपी) 2011-12 में तीन लाख 32 हजार करोड़ था, जो 2016-17 के दौरान बढ़ कर चार लाख 38 हजार करोड़ हो गया. पिछले पांच वर्षों 2011 से 2016 के दौरान राज्य में खनन के क्षेत्र में 67.5%, विनिर्माण में 25.9%, ट्रांसपोर्ट, भंडारण और संचार के क्षेत्र में 13.5% की वृद्धि दर्ज की गयी है. इन सभी क्षेत्रों में विकास दर लगातार 10% से ज्यादा दर्ज की गयी है.

पांच साल से राजस्व अधिशेष वाला राज्य

वित्तीय सेहत की बात करें तो यह लगातार पांच साल से राजस्व अधिशेष (रेवेन्यू सरप्लस) वाला राज्य बना रहा है. राजस्व अधिशेष को बेहतर वित्तीय प्रबंधन का सूचक माना जाता है. यानी राज्य के पास वेतन, पेंशन, पूंजीगत व्यय समेत अन्य जितने तरह के खर्च हैं, उसकी तुलना में राजस्व की प्राप्ति और कर्ज को मिलाकर ज्यादा रुपये आ जाते हैं. वित्त मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार जो भी कर्ज ले रही है, वह विकास कार्यों पर ही खर्च कर रही है, जबकि 2005 के पहले सरकार वेतन और पेंशन देने के लिए कर्ज लेती थी. वर्ष 2016-17 में सकल राजकोषीय घाटा में 4,418 करोड़ की वृद्धि हुई है, जबकि 2015-16 के दौरान इसमें महज 883 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई थी. विकास योजनाओं, आधारभूत संरचना निर्माण के अलावा प्रशासनिक और सामाजिक क्षेत्र में खर्च काफी बढ़ने के कारण चालू वित्तीय वर्ष 2017-18 के दौरान में इसके बढ़कर 18 हजार 112 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है. 2016-17 के दौरान राज्य पर 21 हजार 577 करोड़ का कर्ज था, जो पिछले वर्ष से तीन हजार 194 करोड़ ज्यादा है.

पांच साल से राजस्व अधिशेष वाला राज्य

- राज्य में विकास योजनाओं पर खर्च 2012-13 की तुलना में 2016-17 में बढ़कर 79% हो गया. विकास कार्यों में राजस्व व्यय 35, 817 करोड़ से बढ़ कर 64, 154 करोड़ पहुंच गया. - इस अवधि में गैर विकास कार्यों पर विकास व्यय की तुलना में कम व्यय हुआ. इसमें महज 47% खर्च हुआ, जो 23 हजार 801 करोड़ से बढ़कर 34 हजार 935 करोड़ हो गया. -विकास कार्यों में सबसे ज्यादा ऊर्जा क्षेत्र में 27% (5739 करोड़) खर्च किये गये. इसके बाद 25% (5326 करोड़) सड़क और पुल निर्माण, 08% (1796 करोड़)सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण कार्य पर खर्च किये गये. सामाजिक क्षेत्र में तीन हजार 592 करोड़ खर्च किये गये, जिसमें 24% हिस्सा स्वास्थ्य, जलापूर्ति व स्वच्छता में सुधार पर 32% और शैक्षणिक संरचनाओं में 30% खर्च किया गया.